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Tuesday, July 31, 2018

जुबां

रिश्तों के इस शहर में एक आदमी को बेबसी से मरते देखा है,
हर वक़्त बोलते चेहरों को मायूसी से चुप बैठे देखा है,
ताज में लाखों का ब्रेकफास्ट करते सेठों को भूख से मरते देखा है,
लाखों दिलों की धड़कन को रास्ते पे अकेले सोता देखा है,
बड़ी आलीशान गाड़ी से उतरते सीईओ को मैट्रो में चढ़ते देखा है,
संत सरीखे लोगो को चेहरे से नकाब उतारते देखा है,
मंदिर में घंटी बजाते प्रधानों को दलाली करते देखा है,
साँपो को चीनी खाते, और बिच्छु को नमक खाते देखा है,
बाबू को कूड़ा धोते और चमचे को गद्दी पर देखा है,
अपने दिल के टुकड़े को घर भी बेचते देखा है,
इन बोझिल आंखों से हर अच्छा मंज़र देखा है,
तेरे झूठ को सच कहते भी, अपनी जुबां को देखा है।

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