सीमापुरी की झुग्गी में रहने वाला पीताम्बर दास, यानी पीटू, अभी 10 वर्ष का हो चला था। 1996 की ठंड की दिसम्बरी दुपहर में, पास वाली गली के आलिम अली के घर के पास खड़ा था। आलिम उसका हमउम्र जो था, दोनो भाई गली की रामलीला में भाग लेते थे, आलिम हनुमान की वानर सेना में और पीटू रावण का दैत्य।
पीटू बड़े हसरत भरी निगाह से बड़ी आपा को देख रहा था, जोकि उस समय गर्म अंगीठी के कोयलों पर शकरकंदी पका रही रही। 'क्यों पीटू मियाँ, खायोगे तुम'। 'नहीं मुल्लों के घर खाने को मना किया दद्दू ने'। सच बोल कर झेंप सा गया था वो, बड़ी आपा ठहाका मार के हंसी थी, पान की पीक दीवार पे फेंकते हुए बोली, 'तो फिर खेलते काहे हो आलिम के साथ', 'उसके लिये तो कुछ कहा नहीं दद्दू ने', 'तो मतलब मज़हब तुम्हारा सिर्फ खाने को मना करता है, सही है, हमारा तो न जाने क्या', और 2 बड़ी बूंदे आँसू की टपक पड़ी उनके गाल पर, इतनी बड़ी की शायद पूरी गली ही बह जाती। खुद को संयत करके उन्होंने ऊपर आवाज़ लगाई, 'ऐ नूरो, नीचे कू आ ज़रा तो।' पूरी बस्ती में सिर्फ आलिम का ही पक्का घर था, तीन मंज़िला, बड़ा कुनबा था उनका, बहुत सलीके से रहने वाले लोग, घर की औरते निकलती न थी, और मर्द शाम से पहले घर पहुचते न थे काम से, सो पीटू ने न किसी का नाम सुना और न किसी को देखा ही, देखता भी कैसे बड़ी आपा के अलावा सब बुर्खे में जो रहती थी।
खैर, नुरो नीचे आई, पटियाला सूट, लंबी चोटी, ऊंचा कद, तिरछी निगंहे, सीधी सादी बहुत ख़ूबसूरत और उन्नत उरोजों वाली लड़की, मैकउप के नाम पर केवल काजल, और होंठो के बीच के एक तिल।
'ऐ लल्ला, ले शकरकंदी' पता नहीं कितनी देर से बड़ी आपा पुकार रही थी, और पीटू टकटकी लगाए नुरो को देख रहा था।
'क्यों मियाँ, इश्क़ हो गया क्या मेरी नुरो से'।
पीटू वास्तविकता में लौट आया था। और पूरा चेहरा लाल। बहुत झेंप गया था।
खालू, आप भी ना। कहके नुरो ने पीटू के गाल पर किसी कर दी।
पीटू को लगा जैसे किसी ने 100 विओलिन्स का ऑर्केस्ट्रा चला दिया हो। और वो जीतू जी की तरह ता थिया, ता थिया हो गा रहा हो।
पीटू झट से उठा, और 2 शकरकंदी उठा के भाग चला। एक झट से उसने मूँह के पास लगा ली। 'कह दूंगा की जबर्दस्ती खिला दी'।
पीटू बड़े हसरत भरी निगाह से बड़ी आपा को देख रहा था, जोकि उस समय गर्म अंगीठी के कोयलों पर शकरकंदी पका रही रही। 'क्यों पीटू मियाँ, खायोगे तुम'। 'नहीं मुल्लों के घर खाने को मना किया दद्दू ने'। सच बोल कर झेंप सा गया था वो, बड़ी आपा ठहाका मार के हंसी थी, पान की पीक दीवार पे फेंकते हुए बोली, 'तो फिर खेलते काहे हो आलिम के साथ', 'उसके लिये तो कुछ कहा नहीं दद्दू ने', 'तो मतलब मज़हब तुम्हारा सिर्फ खाने को मना करता है, सही है, हमारा तो न जाने क्या', और 2 बड़ी बूंदे आँसू की टपक पड़ी उनके गाल पर, इतनी बड़ी की शायद पूरी गली ही बह जाती। खुद को संयत करके उन्होंने ऊपर आवाज़ लगाई, 'ऐ नूरो, नीचे कू आ ज़रा तो।' पूरी बस्ती में सिर्फ आलिम का ही पक्का घर था, तीन मंज़िला, बड़ा कुनबा था उनका, बहुत सलीके से रहने वाले लोग, घर की औरते निकलती न थी, और मर्द शाम से पहले घर पहुचते न थे काम से, सो पीटू ने न किसी का नाम सुना और न किसी को देखा ही, देखता भी कैसे बड़ी आपा के अलावा सब बुर्खे में जो रहती थी।
खैर, नुरो नीचे आई, पटियाला सूट, लंबी चोटी, ऊंचा कद, तिरछी निगंहे, सीधी सादी बहुत ख़ूबसूरत और उन्नत उरोजों वाली लड़की, मैकउप के नाम पर केवल काजल, और होंठो के बीच के एक तिल।
'ऐ लल्ला, ले शकरकंदी' पता नहीं कितनी देर से बड़ी आपा पुकार रही थी, और पीटू टकटकी लगाए नुरो को देख रहा था।
'क्यों मियाँ, इश्क़ हो गया क्या मेरी नुरो से'।
पीटू वास्तविकता में लौट आया था। और पूरा चेहरा लाल। बहुत झेंप गया था।
खालू, आप भी ना। कहके नुरो ने पीटू के गाल पर किसी कर दी।
पीटू को लगा जैसे किसी ने 100 विओलिन्स का ऑर्केस्ट्रा चला दिया हो। और वो जीतू जी की तरह ता थिया, ता थिया हो गा रहा हो।
पीटू झट से उठा, और 2 शकरकंदी उठा के भाग चला। एक झट से उसने मूँह के पास लगा ली। 'कह दूंगा की जबर्दस्ती खिला दी'।
क्रमशः
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