एक जिद्दी और मग़रूर शैतान, जो अपने होने का अहसास दिलाता है, और फिर अपनी उसी काली दुनिया में खो जाता है, जहाँ कोई आवाज़ नहीं आती।
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6th Sense
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Friday, July 24, 2020
Saturday, July 18, 2020
कुम्हलाता नव अंकुर
बरबस टटोलना तुम खुद को,
पर तुम्हारी यादों से, कपूर की तरह उड़ जाऊँगा मैं।
बर्फ़ की तरह छवि सम्भाल कर रखना तुम,
और मैं जून की गर्मी सा भाप में उड़ जाऊँगा। ।
पर तुम्हारी यादों से, कपूर की तरह उड़ जाऊँगा मैं।
बर्फ़ की तरह छवि सम्भाल कर रखना तुम,
और मैं जून की गर्मी सा भाप में उड़ जाऊँगा। ।
मैं एक अतीत हूँ,
एक अनन्त यात्रा का पथिक।
जिसका कोई विराम नहीं,
जो प्रचंड अघोर है।
मैं प्रति पल आगे बढ़ रहा
अपनी उसी काली दुनिया में,
जहाँ कहीं कोई आवाज़ नहीं आती।
न सूर्य की कोई किरण है,
न नव संरचना,
और न ओस में कुम्हलाता,
कोई नव अंकुर जीवन का।।
एक अनन्त यात्रा का पथिक।
जिसका कोई विराम नहीं,
जो प्रचंड अघोर है।
मैं प्रति पल आगे बढ़ रहा
अपनी उसी काली दुनिया में,
जहाँ कहीं कोई आवाज़ नहीं आती।
न सूर्य की कोई किरण है,
न नव संरचना,
और न ओस में कुम्हलाता,
कोई नव अंकुर जीवन का।।
काफिर की मौसिकी
काफिर न था प्यार में,
इबादत ने जो बना दिया,
पढ़ा करते थे काफिये,
मौसिकी ने सब भुला दिया.
मगरूर था, खुद से बेखबर भी
बेपरवा था, खुद से बेअसर भी
तुझसे रंज थे, बेअदबी भी,
तुझपे तंज थे, बेकतबी भी
सोचा था मखौल तेरा बनाऊंगा
तुझपर पड़ते हैं जो सजदे,
उनको पढने से पहले उठाऊंगा,
जो चिल्लाते हैं की,
तेरा कलमा पढना है जरूरी,
उनको चश्मों चिराग दिखाऊंगा,
तू तो सोया है मगर,
सबको झन्नाटे से उठलाऊंगा,
मंशा पूरी न मेरी हुई,
जो तूने करवट उल्ट ही कर ली.
तेरी रूहानियत के किस्से,
बन मैं श्याहे दवात हो जाता हूँ,
लिखते हैं खत जभी,
आबो हवा में सूख जाता हूँ,
कई रोज़ गये, इबादत हुए,
लोगो ने न सजदे किये,
हैराँ हूँ परेशां भी
तू बैठा क्यों मुस्कुरा रहा है?
जवाब दिए बिना, तू मदमस्त,
धूनी कहींको रमा रहा है,
तेरे चुप्पे पे चुप्पी अब मेरी
अब हूँ, न हाँ कुछ भी नही
~ जीतू सिन्धी
इबादत ने जो बना दिया,
पढ़ा करते थे काफिये,
मौसिकी ने सब भुला दिया.
मगरूर था, खुद से बेखबर भी
बेपरवा था, खुद से बेअसर भी
तुझसे रंज थे, बेअदबी भी,
तुझपे तंज थे, बेकतबी भी
सोचा था मखौल तेरा बनाऊंगा
तुझपर पड़ते हैं जो सजदे,
उनको पढने से पहले उठाऊंगा,
जो चिल्लाते हैं की,
तेरा कलमा पढना है जरूरी,
उनको चश्मों चिराग दिखाऊंगा,
तू तो सोया है मगर,
सबको झन्नाटे से उठलाऊंगा,
मंशा पूरी न मेरी हुई,
जो तूने करवट उल्ट ही कर ली.
तेरी रूहानियत के किस्से,
बन मैं श्याहे दवात हो जाता हूँ,
लिखते हैं खत जभी,
आबो हवा में सूख जाता हूँ,
कई रोज़ गये, इबादत हुए,
लोगो ने न सजदे किये,
हैराँ हूँ परेशां भी
तू बैठा क्यों मुस्कुरा रहा है?
जवाब दिए बिना, तू मदमस्त,
धूनी कहींको रमा रहा है,
तेरे चुप्पे पे चुप्पी अब मेरी
अब हूँ, न हाँ कुछ भी नही
~ जीतू सिन्धी
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