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6th Sense

Sixth Sense as they call it. Many, actually millions of us are trying our hands to know what this actually is. How this works and the proces...

Wednesday, November 21, 2018

प्याज़ के टुकड़े

परत दर परत छिलते हुए,
प्याज़ के टुकड़े,
चुभते हैं नश्तर की तरह,
उन आँखों को,
जो अभी ताज़ी ही,
अंधी हुई हैं।

कच्ची गीली मिट्टी से,
रिसती दूध की बूंदें
कूड़े  के ढेर में,
तड़पाती है,
उस बिलखते बालक की
लिजलिजाई नाक को,
जिसे एक कुत्ते ने,
अभी नोचा था।।

स्वर्णिम सूर्य,
को अर्घ्य देते ताम्र कलश में,
गिरती ख़ून की बूंदे,
नुचे हुए,
उस कबूतर के जिस्म की,
जिसको अभी गुलेल लगी है।

चंद्र समान उज्ज्वल वो,
कांतिमयी आभा,
जो कह गई निशाचर,
इक हरिन शावक को,
जो ज़िन्दा ही पक रहा,
सुदूर किसी महफ़िले तन्दूर में।।

ज़रूरी नहीं है,
तुम्हारा महसूस करना,
और न अनुभव करना,
उस पीड़ा का,
जो मैंने अनुभव की हों।
तुम्हारी रुक्षता ही समझाती है,
कितनी वेदना से गुजरे हो तुम।।

- जीतू सिंधी

Sunday, November 11, 2018

समझना

तुम्हें समझाने की कोशिश कभी की ही नहीं,
और ना ही जतलाया की तुम्हें कितना पसंद करता हूँ मैं,
क्या जानती नहीं तुम,
की कितना दूर भागता हूँ मैं लोंगो की भीड़ से,
और उस नकली गर्माहट से,
जो लोग बेमतलब के गले लग कर जताते हैं।
जान लो, बहुत मुश्किल और असहज होता है मेरे लिए,
किसी के पास आ कर उसे गले लगाना।
कलेजे में सिहरन सी दौड़ जाती है,
दिमाग शून्य सा हो जाता है।।
उतने सब लोगों की भीड़ में,
फ़ोटो के लिए,
हम गले लगे, ऐसा मालूम पड़ा,
जाहिर था,
की सब आगंतुकों से लगभग गले मिल कर ही मैं स्वागत कर रहा था,
पर लगा जैसे तुम उदास हो,
स्वयं के अंदर झाँका,
तब मालूम हुआ कि, कोई और भी असहज हो सकता है,
गले लगने से,
फिर कभी बात करने का मौका ही नहीं मिला,
सोचा कि तुम्हें बताऊँ, या पूछुं?
पर ये शायद भद्दा लगें,
और दरअसल ये ग़लत भी तो है,
बिना स्वीकृति के, या बिना हामी भरे,
आप किसी के गले नहीं लग सकते।

तुमसे सीधे कहना या पूछना,
तुम्हें और पीड़ा देगा,
यह सोच कर, कभी बात छेड़ी ही नहीं।

मन पर एक बोझ सा लगा,
सोचा कि लिख दूँ,
तुम पढ़ती जरूर हो,
और हमेशा से मेरे अहसासों में जिंदा भी।

Thursday, November 8, 2018

ख़ामोश

बहुत दिन से सोच रहा था कि तुम्हें चिट्ठी लिखूँ, पर तुम नाराज़ थे, और दशकों से दूर भी। तो कभी दिल का हाल कह नहीं पाया, आज सोचा कि सब लिख कह डालूँ।
तुम्हें जान कर ख़ुशी होगी कि अब हर साल मेरा पता, एक नया पता होता है। पहचान तो, ख़ैर, वही पुरानी वाली है। मैं अब यूँ दुःखी नहीं रहता, ख़ूब हँसता और हँसाया करता हूँ, गाड़ी और घर की दिक्कत कभी ली नहीं, क्योंकि उतनी दौलत कभी जोड़ी नहीं।
तुम्हारा आख़िरी बार का चेहरा याद आता है, तुम अचानक से घर मे पहुँच कर, बिना आहट किए घड़ी के cell बदल रहे थे, मैं आँखे बंद किये किसी गाने का रियाज़ कर रहा था। गाना ख़त्म हुआ, तुमने कहा, की अकेले क्यों गाते हो, रूहानियत है, सबसे बाँटा करो, मैंने हामी भरी भी पर वो मेरा शायद आखिरी गाना ही था, क्योंकि उसके बाद के 15 साल मैने कभी कुछ गाया, गुनगुनाया ही नहीं। कारण? तुम जानते हो, इसलिए फिर नहीं कहूँगा।
अगले दिन, घर में सब बदहवास थे, पापा बोले, राजेश ड्रग ओवरडोज़ से मर गया, दादा को लगता था कि गोली ने सुसाइड करी है। मेरी समझ से परे था, की इतना स्मार्ट, हैंडसम लड़का जो बिल्कुल राजेश खन्ना सा लगता है, क्यों, और आखिर क्यों सुसाइड करेगा ?
जवाब तो अब भी नहीं है मेरे पास, बचपन में मैं बोलता कम, ख़ामोश ज़्यादा रहता था, बातें होती थी तो महीने के शायद 10 या 20 वाक्य, उनमें से 5 वाक्य तुम्हारे साथ भी होते थे।
खैर तुम्हें पता न हो तो बतला दूँ, की पुलिस ने तुम्हारी बॉडी देने में कितना सताया था हम लोगों को, मैं उस दिन घंटो मोर्चरी में डटा था, शायद, याद नहीं घंटे की दिन। काफ़ी अनोखा था वो सब देखना मेरे लिए; अनगिनत लाशें, खड़ी, आड़ी टेड़ी, बैठी, लेटी, नंगी और कफ़न में ढकी, हाँ सबके पैर में एक टैग जरूर था।
, हंगामा तो बहुत हुआ, पर मैं हटा नहीं, जब तक कि तुम हमारे साथ न चले।
मैं आज तक समझ नहीं पाता हूँ, की यदि तुमने आत्महत्या की थी तो तुम्हारे चेहरे और वो आभा, वो मुस्कान कैसे हो सकती थी ? ऐसा सुर्य की मानिन्द दमकता चेहरा तुम्हारा, शायद अभी तक किसी लाश को मैंने ऐसे मुस्कुराते न देखा हो ।
दादा जब तक जीवित रहे मुझे तुमसे compare करते रहे, गोली और तू, तू और गोली क्योंकि शायद उनके लिए मैं तुम्हारा डुप्लीकेट था।
तुम्हारे जाने के बाद से मेरा जीवन सामान्य न रहा था, और लगता है कि जीवन के अंत तक मैं बदलता ही रहूँगा। तुम्हारे हर वर्ष कुछ नयापन खोजने और ख़ुद को बेहतरी से बदलने की आदत को शायद में काफ़ी पहले अपना चुका था।
घर में फिर न तो कभी तुम्हारा ज़िक्र हुआ, और ना ही तुम्हारी जन्मतिथि या पुण्यतिथि ही मनाई गई, हाँ श्राद्ध में मैं जरूर पंडित के सामने chowmein रख देता था, तुम्हें बहुत पसंद थी न ?

एक ख़ास बात जो कहनी है तुमसे, गोली चाचा तुम वास्तव में करीब थे मेरे, दुनिया शायद तुम्हें अब भी अपराधी मानती हो, पर मैं तुम्हें काफी पहले ही माफ़ कर चुका हूँ।
और अब मैं इस बात की ताकीद करता हूँ, की मेरे रूम की दीवार पर कोई घड़ी न टंगी हो, क्योंकि अब तुम्हारे दबे कदमों की छिपी आहट, और वो घड़ी के cell बदलने को मैं सह नहीं पाउँगा, और शायद तुम्हें चुप्पे से बिठा भी लूँ।
यकीं जानना की तुम्हारे जाने के बाद मैं कई मौतों में गया हूँ, पर आज तक आंसुओं ने आँख में जगह नहीं बनाई। डींगें नहीं हांक रहा हूँ, पर बता रहा हूँ, की तुम्हारे जाने से कुछ ख़ास फ़र्क न पड़ा है। भीतर से आज भी मैं वो अजीब सा बच्चा ही हूँ, जो मार पड़ने पर ना रोता है और न चिल्लाता है, जो ग़लती न होने पर पकड़े जाने पर प्रतिकार नहीं करता है, बस हर परिस्थि से बाहर निकल कर तटस्थ रहना चाहता है।
शायद हर जीव का एक अकाट्य कर्म सिद्धांत होता है, हम उसके बारे में कभी बाद में बात करेंगें ।

मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूं, और न ही कभी ख़फा ही था, केवल यह कि, अब मैं महीने के कुछ 10 20 हजार शब्द बोल लेता हूँ, तुम होते तो उसमें से 5 हजार तुम्हारे होते, यही एक पूँजी है मेरे पास जो तुमसे हमेशा साझा करना चाहता था। तुम्हारा जीतू।

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जो जानते है मुझे उनके लिए ये #fiction, और जो नहीं जानते वो इसे #nonfiction समझे।