तुम्हें समझाने की कोशिश कभी की ही नहीं,
और ना ही जतलाया की तुम्हें कितना पसंद करता हूँ मैं,
क्या जानती नहीं तुम,
की कितना दूर भागता हूँ मैं लोंगो की भीड़ से,
और उस नकली गर्माहट से,
जो लोग बेमतलब के गले लग कर जताते हैं।
जान लो, बहुत मुश्किल और असहज होता है मेरे लिए,
किसी के पास आ कर उसे गले लगाना।
कलेजे में सिहरन सी दौड़ जाती है,
दिमाग शून्य सा हो जाता है।।
उतने सब लोगों की भीड़ में,
फ़ोटो के लिए,
हम गले लगे, ऐसा मालूम पड़ा,
जाहिर था,
की सब आगंतुकों से लगभग गले मिल कर ही मैं स्वागत कर रहा था,
पर लगा जैसे तुम उदास हो,
स्वयं के अंदर झाँका,
तब मालूम हुआ कि, कोई और भी असहज हो सकता है,
गले लगने से,
फिर कभी बात करने का मौका ही नहीं मिला,
सोचा कि तुम्हें बताऊँ, या पूछुं?
पर ये शायद भद्दा लगें,
और दरअसल ये ग़लत भी तो है,
बिना स्वीकृति के, या बिना हामी भरे,
आप किसी के गले नहीं लग सकते।
तुमसे सीधे कहना या पूछना,
तुम्हें और पीड़ा देगा,
यह सोच कर, कभी बात छेड़ी ही नहीं।
मन पर एक बोझ सा लगा,
सोचा कि लिख दूँ,
तुम पढ़ती जरूर हो,
और हमेशा से मेरे अहसासों में जिंदा भी।
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