जब सर्द रातों में,
ठिठुरते हो हाथ,
पाँव में न हो मोजे,
और न कम्बल का साथ|
भीख सही,
या अहसान कभी,
यूँ न ठुकराओ,
जिन्दगी कहती है,
ए प्यारे.
कभी मान भी जाओ
दिल में भरी हो उदासी,
और न हो संगी साथी,
कलम कागज को,
बना के साथी
कल्पना को यूँ न दबाओ
कभी मान भी जाओ
जब जेब में न हो धेले चार,
पेट की आफत,
पुकारे साथी,
गुरूद्वारे में प्रसाद खा के,
शर्म में न डूब जाना
कभी मान भी जाओ
धोखे हुए जब हजार
मरने का मन करे बार बार
तब उपरवाले के लिए
न कूदना
बचाना अपनी जान
कभी मान भी जाओ