परत दर परत छिलते हुए,
प्याज़ के टुकड़े,
चुभते हैं नश्तर की तरह,
उन आँखों को,
जो अभी ताज़ी ही,
अंधी हुई हैं।
कच्ची गीली मिट्टी से,
रिसती दूध की बूंदें
कूड़े के ढेर में,
तड़पाती है,
उस बिलखते बालक की
लिजलिजाई नाक को,
जिसे एक कुत्ते ने,
अभी नोचा था।।
स्वर्णिम सूर्य,
को अर्घ्य देते ताम्र कलश में,
गिरती ख़ून की बूंदे,
नुचे हुए,
उस कबूतर के जिस्म की,
जिसको अभी गुलेल लगी है।
चंद्र समान उज्ज्वल वो,
कांतिमयी आभा,
जो कह गई निशाचर,
इक हरिन शावक को,
जो ज़िन्दा ही पक रहा,
सुदूर किसी महफ़िले तन्दूर में।।
ज़रूरी नहीं है,
तुम्हारा महसूस करना,
और न अनुभव करना,
उस पीड़ा का,
जो मैंने अनुभव की हों।
तुम्हारी रुक्षता ही समझाती है,
कितनी वेदना से गुजरे हो तुम।।
- जीतू सिंधी
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