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Saturday, July 18, 2020

काफिर की मौसिकी

काफिर न था प्यार में,
इबादत ने जो बना दिया,
पढ़ा करते थे काफिये,
मौसिकी ने सब भुला दिया.

मगरूर था, खुद से बेखबर भी
बेपरवा था, खुद से बेअसर भी

तुझसे रंज थे, बेअदबी भी,
तुझपे तंज थे, बेकतबी भी

सोचा था मखौल तेरा बनाऊंगा
तुझपर पड़ते हैं जो सजदे,
उनको पढने से पहले उठाऊंगा,

जो चिल्लाते हैं की,
तेरा कलमा पढना है जरूरी,
उनको चश्मों चिराग दिखाऊंगा,
तू तो सोया है मगर,
सबको झन्नाटे से उठलाऊंगा,

मंशा पूरी न मेरी हुई,
जो तूने करवट उल्ट ही कर ली.

तेरी रूहानियत के किस्से,
बन मैं श्याहे दवात हो जाता हूँ,
लिखते हैं खत जभी,
आबो हवा में सूख जाता हूँ,

कई रोज़ गये, इबादत हुए,
लोगो ने न सजदे किये,
हैराँ हूँ परेशां भी
तू बैठा क्यों मुस्कुरा रहा है?

जवाब दिए बिना, तू मदमस्त,
धूनी कहींको रमा रहा है,
तेरे चुप्पे पे चुप्पी अब मेरी
अब हूँ, न हाँ कुछ भी नही

~ जीतू सिन्धी

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