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Tuesday, July 3, 2018

लखुमल, गोलगप्पे वाले

मै कोशिशें करता गया, लोग मुझे बताते रहे कि मै कितना गलत कर रहा हूँ।
आक्रोश, चिल्लाहट, से बदलकर झुंझलाहट, बौखलाहट में बदलती गयी, फिर एक गहन सी चुप्पी फैलने लगी।
धीरे धीरे समझ मे आने लगा कि आप जीते नहीं है, आपको जीना सीखाया जाता है। जड़बुद्धि अनपढ़ आदमी को सीखने में टाइम तो लगता ही है, सो मुझे भी लगा, जब समझ में आने लगा कि मै कितना गलत हूँ, तो जिंदगी काफी आसान है। सब कुछ तो सही है इसमें, कुछ भी गलत नहीं।
और सबसे अहम बात, की बिना उद्देश्य के कोई कार्य नही होता, ठीक वैसे ही जैसे बिना पत्ती के चाय नही बनती।
खैर, 1996 की फरवरी की पहली सुबह को, बंदर वाली खुई, के मुहाने पर पीपल के पेड़ के सामने वाली नाली पर मै मल त्याग कर रहा था। ठंडी ठंडी हवा चल रही थी, और अचानक पानी का लोटा नाली में गिर गया, पहली बार जीवन मे मिट्टी और रेत का मायना समझ आया।
(अगला भाग परसो: कहानी: लखुमल, गोलगप्पे वाले)

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