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Wednesday, July 25, 2018

पागल गिरगिट का थूक

'अरे नहीं सच में मैं बहुत बड़ा गधा हूँ।', नीरज बोलना चाहता था, ऑफिस की उस पार्टी में जहां उसका सम्मान किआ गया था। नीरज को तो हमेशा से ही लगता था, जैसे उसको किस्मत ही हर जगह पहुँचा रही हो, और वो अनमने मन से आगे बढ़ रहा हो।
बहुत ही बढ़िया बचपन था उसका, जे जे कालोनी के स्लम एरिया में रहते थे, बात बात पर कुटाई होना, दिसंबर की मस्त सर्दी में खुले आसमान में नंगे बदन सोना, कितना पसंद था उसको, हाँ यही कहता था वो अपने दोस्तों से, क्योंकि बाप तो उसको मार मार के कपड़े उतरवा के घर के बाहर फेंक जो देता था।
ऐ शोंटी, इधर आ।
पास के कूड़ेदान से एक सड़ा पिचका टमाटर उठा के उसने अपने पर्मानेंट तकिये को बुलाया।
शोंटी शोंटी  झट उसके सिर के नीचे तकिया बन के लेट गया।
पूरे मोहल्ले का अकेला पिल्ला जो केवल टमाटर खा के जीता था, शायद नीरज ने ही उसे बिगाड़ दिया था। 



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