चौराहे पर नीलाम होती आबरू ही तो है, क्या फ़र्क, क्यों तौबा,
न तेरी, न मेरी, किसी और कि ही तो है,
बहुत छोटी बच्ची थी, या बुज़ुर्गवार महिला थी,
हादसे का शिकार हुई कोई वो बेबस अबला थी।
निःशब्द, निस्तब्ध, कलेजा फट क्यों नहीं जाता,
जब किसी की यूँ जिंदगी हलाक होती है।
चाय की चुस्कियों पर रेप की खबरें सुनने वाले कान,
किसी विस्फोट में उड़ क्यों नहीं जाते।
किसी मासूम परिंदे को जाल में फ़साने वाले हाथ कट क्यों नहीं जाते।
क्यों नहीं electorcute होते वो दिमाग, जो प्लानिंग करते हैं, किसी स्त्री पर अत्याचार करने को।
क्यों नहीं ये दंगों, बलवों, जुलूसों की भीड़ रोकती किसी हादसे को,
और क्यों हम सोशल मीड़िया पर ही क्रान्ति ला रहे हैं।
कितना अनर्गल, मिथ्याभाषण है, मेरा भी ये लिखना,
जब अपवाद में मेरे पड़ोसी ही भेड़िए निकल रहे हैं।
न तेरी, न मेरी, किसी और कि ही तो है,
बहुत छोटी बच्ची थी, या बुज़ुर्गवार महिला थी,
हादसे का शिकार हुई कोई वो बेबस अबला थी।
निःशब्द, निस्तब्ध, कलेजा फट क्यों नहीं जाता,
जब किसी की यूँ जिंदगी हलाक होती है।
चाय की चुस्कियों पर रेप की खबरें सुनने वाले कान,
किसी विस्फोट में उड़ क्यों नहीं जाते।
किसी मासूम परिंदे को जाल में फ़साने वाले हाथ कट क्यों नहीं जाते।
क्यों नहीं electorcute होते वो दिमाग, जो प्लानिंग करते हैं, किसी स्त्री पर अत्याचार करने को।
क्यों नहीं ये दंगों, बलवों, जुलूसों की भीड़ रोकती किसी हादसे को,
और क्यों हम सोशल मीड़िया पर ही क्रान्ति ला रहे हैं।
कितना अनर्गल, मिथ्याभाषण है, मेरा भी ये लिखना,
जब अपवाद में मेरे पड़ोसी ही भेड़िए निकल रहे हैं।
- जब दिल पर बोझ होता है तो लिखता हूँ, अब ये झूंझ है या गिल्ट या एक बौखलाहट, अच्छा है कि सिर्फ़ खुद के लिए लिखता हूँ।
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