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Tuesday, July 31, 2018

आज के आर्यपुरुष

क्या कभी लगा तुम्हें,
की कपड़ो से लबरेज़ तन तुम्हारा,
नंगा है भीतर से।
और, बाहर निकलते रास्तों पर देख सकते लोग तुम्हारी नग्न देह।।
लपलपाती जिव्हा, वासना से भरे नेत्र, देखते हैं, नोचने को नग्न तुम्हारी देह।
कितना मूर्ख था ईश, जो उसने नग्न संसार बनाया,
क्या पता था उसको, जो छिपा के रखना अंगों को, बन जायेगा संस्कृति हमारा।
न चाहते हुए भी देखेंगे अंगों के उभार,
चाचा, भैया, और मौसा,
मैंने तो कभी उनसे न कहा, और ना ही दी स्वीकृति,
की आयो निहारो मेरे अंग प्रत्यंग को, और तृप्त करो अपनी काम क्षुधा को।।
और कहीं, किसी सभ्य समाज में,
खुद को बहलाती,
देखती नग्न मांसल देह,
दीदी, बुआ, चाची और मौसियाँ।।
बहुत प्रगतिशील है हम, बढ़ रहे हैं आगे,
आसान है, माँगना देह तृप्ति के साधन को,
क्या अघोर हो चले हैं,
जो भूल गए किसी रिश्ते की मर्यादा को।
शायद नहीं कुंती, बिल्कुल नहीं द्रौपदी,
कदाचित, उत्तम कुल में जन्मे है,
बहुत संस्कारी हैं आज के ये आर्यपुरुष।।
#stare - जीतू

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