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Tuesday, July 3, 2018

अनोखी का छाता

                                                               
                                                                          अनोखी का छाता

"क्या होता है कार में,
पास की चीज़ें पीछे छूट जाती हैं तेज़ रफ़्तार में ,
और वही चीज़ें देर तक साथ रहती हैं जो बहुत दूर हैं।"

अनोखी को लॉन्ग-ड्राइव बहुत पसंद थी  और वो सोलो ट्रैवलर बन कर जब भी निकलती थी तो अपना पुश्तैनी छाता लेना नहीं भूलती थी।  बड़ा ही बेढंगा छाता था वो। बाँस की खप्पचियों से बना, मतलब ना तो उससे बारिश में बचा जा सकता था, और न धुप और आंधी से। पर अनोखी को इन सबसे फ़र्क क्या पड़ता था। उसे कौनसा छाता खोल कर रैंप वाक करना था।  ये तो सिर्फ़ इस अकेली लड़की का इतने बड़े शहर में हमसफ़र था, बाथरूम से लेकर बिस्तर तक हर जगह पर। बहुत ही एहतियात से रखती थी वो इसे और पूरे दिन में सिर्फ़ एक बार खोल कर बंद करना मानो कोई जादुई वस्तु हो और अनोखी उससे हर दिन कोई विश मांगती हो। पूछो तो जवाब देती नहीं थी कभी किसीको। न कोई दोस्त न रिश्तेदार। हाँ, एक बड़ी MNC में मोटी तनख्वाह पाने वाली वो अकेली लड़की थी जिसने अभी जीवन के २४ वसंत तक न देखे हों।
 
और हर बार की तरह इस बार भी वो इस छाते को अपनी कार में लिए अपने वीकेंड डेस्टिनेशन पर निकली। लोनावला के कच्चे रास्ते में आकर उसकी कार के पिछले दोनों ही टायर पेंचर हो गए। मूसलाधार बारिश में जैसे तैसे उसने स्टेपनी तो बाँधी पर हिम्मत न हुई की टायर चेंज कर दूँ। काफी देर मशक्कत करने पर भी जब कोई गाड़ी उसकी मदद करने को ना रुकी तो उसने सोचा क्यों न गाँव वालो की मदद ली जाएँ, टूटी फूटी मराठी में उसने तैयार पंचर तैयार करने के लिए एक खुर्राट चच्चा को मना भी लिया। चच्चा ने टायर पंचर तो किया पर उनका पूरा ध्यान अनोखी की भीगती हुयी काया पर थी। और अनोखी को भान तो हुआ की की शायद इस शख़्स को बुला कर उसने कोई गलती की है , पर अपने कपड़े ठीक करते हुए वो धम्म से ड्राइवर सीट पर बैठ गई और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। गाड़ी के वाईपर टक -टक करते मानो उसके अंदर के शोर को बढ़ा रहे थे। अचानक वो सीट से उठी, अपना छाता बाहर निकाला और चच्चा जिनका नाम था दखलू सोन्या, उनकी पीठ पर खोल दिया।  खुर्राट चच्चा के मुँह से चीख़े निकल गई, उन्होंने अपनी लुँगी सम्भाली और यूँ भाग चले जैसे इंदिरा गाँधी का भूत देखा हो। हँसती, मुस्कुराती अनोखी ने जल्दी से टायर के नट कसे और झट गाड़ी में बैठ कर किसी फार्मूला वन रेसर की तरह गाडी भगाई, आज वो बात करने के मूड में थी।

एक हाथ से स्टीयरिंग संभालते हुए,दूसरे हाथ से उसने छाते को उठाया, बहुत प्यार से चूमा और बोली "आज तूने दूसरी बार मेरी जान बचायी है। "

ये छाता उसे उसकी नानी ने गिफ्ट में दिया था, शायद उनकी नानी ने उनको दिया हो , पीढ़ी दर पीढ़ी छाते देने का ये दस्तूर कायम रहा और अनोखी का नाम भी अनोखी छाते वाली हो गया था।  बहरहाल, भरा पूरा परिवार था अनोखी का , यूँ हमेशा से अकेली थोड़े ही थी वो ; २००५ में आई मुंबई की भयंकर बाढ़ में उसका पूरा परिवार बह चला था।
और उस समय वो १० साल की मासूम सी गुड़िया , अपने सपनो में  खोयी थी, अपने बिस्तर पर पढ़ी , छाते संग लिपटी सोई थी।  बाढ़ में जैसे सब कुछ तहस नहस हो गया था, उसका पूरा घर ही बह चला था, घर क्या था साहब, टीन का टपड़ा भर था।

पर उस मासूम बच्ची का रखवाला वो छाता था, तख़्त के किनारे पर फंसा वो छाता,बहते बहाते उसे एक बड़ी बिल्डिंग के पास ले आया था।  जहाँ एक बुज़ुर्ग दम्पत्ती अपने आखिरी पल गिन रहे थे।  और अनोखी को देखते ही  मानो उनकी मन की मुराद पूरी हो गई, उन्होंने तुरंत अनोखी को गोद ले लिया और जाते जाते उसे अपनी पूरी प्रॉपर्टी का वारिस भी बना गए। 

बड़े शहर की आपा धापी में अनोखी ने अकेले जीना सीख लिया है , और उसके दिल के गहरे कोने में एक उम्मीद भी है की शायद कोई आएगा उसकी ज़िन्दगी में, और इस छाते को रिप्लेस कर पायेगा।  और ठीक इस छाते की तरह अनोखी का साथ ताउम्र निभाएगा, बचाएगा उसे हर काले साये से और अपने आगोश में सुलाएगा।   


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