"ग़ुरूर और नशा, तुम्हे मुकम्मिल होने नही देगा।"
ये बात वो कई साल पहले कह देना चाहता था। पर उसको हमेशा एक डर था, की जिसको वो चाहता है, बिना ग़ुरूर के वो एक बुत सी नज़र आएगी, और शायद ये बात न कहना रमेश की सबसे बड़ी भूल थी, शालिनी हर चीज़ का कुसूरवार उसको ठहराती रही, उसको तड़पाने और तरसाने में शालिनी को बड़ा मजा आता था।
शायद उसको इस बात का इल्म ना था, की रमेश उससे बेहद प्यार करता था, रमेश के जीवन के दो ही लक्ष्य थे, एक खुद को इतना कामयाब बनाना की उसके परिवार में किसी दुख का साया भी ना आ सके, और दूसरा शालिनी को अपनी जीवनसंगिनी बनाना। पर परिवार में आई एक बड़ी विपत्ति ने, उसे इन दोनों से बहुत दूर कर दिया। अपने परिवार को इस समस्या से उबारने के लिए, उसने तिलांजलि दे दी अपने सर्वस्व की, मित्रो ने बहुधा कहा भी, की कलयुग में श्रवण कुमार ना बनो, पर उसने एक की नही सुनी, लगभग 10 वर्षो के बाद, शालिनी से उसकी फेसबुक पर बात हुई, वो बहुत खुश था, फुला न समा रहा था, पर उसकी खुशी तो बेमानी निकली।
शालिनी वो पहले वाली शालिनी न रही थी, इन दस सालों में कई मुसीबतों से गुजर चुकी थी वो, दो शादी, एक डिवोर्स, एबॉर्शन और मानसिक यातनाओ से उबरने के लिए थेरपी ले रही थी। नई शादी भी फिलहाल एक समझौता मात्र थी। रमेश के मन मे कई सवाल थे, और वो शालिनी से मिलना भी चाहता था, पर शालिनी और रमेश के बीच हाय हैल्लो के अलावा कोई शब्द ही नही होता था बात करने को। शालिनी की दोस्त रेणूका के बाबत रमेश को शालिनी की वर्तमान अवस्था का अंदाज़ा हो चुका था, और उसका प्यार शालिनी के लिए बढ़ता ही जा रहा था, शालिनी को भी , रेणुका ने रमेश का पूरा सच बतला दिया था। और 2 मार्च की रात को शालिनी का फ़ोन रमेश को आया। 'आज का दिन याद है तुम्हे', शालिनी की मनमोहक आवाज़ ने रमेश की हृदयगति को मानो 10 गुना बढ़ा दिया था। अकबका सा रमेश 'न नहीं तो' प्रत्युत्तर में बोल चुका था, सामने से जवाब आया , 'आजके ही दिन तुमने मुझे छोड़ दिया था' और रोने की आवाज़ के साथ फ़ोन कट हो गया। रमेश को मानो तो जैसे सांप सूंघ गया था। निस्तब्ध, अनमना सा वो बिस्तर पर गिर गया, सारी पुरानी बाते अचानक से उसके मस्तिष्कपटल पर घूमने लगी।
रोती हुई शालिनी को देख कर, पीछे से उसके पति दुर्गेश ने पुचकारा, सहमी सी वो दुर्गेश के आलिंगन में जकड़ गयी। दुर्गेश उसका हमसफर ही नही, अच्छा मित्र भी था, और शालिनी के अतीत से वाकिफ भी था। 'एक बार मिल क्यो नही लेती तुम उससे, आखिर उसको भी अधिकार है अतीत से बाहर आकर आज में जीने का'। शालिनी हतप्रभ सी दुर्गेश को देखने लगी, 'क्या कह रहें है आप, जानते भी है, की मैं उससे मिली तो खुद को रोक न पाउंगी, और कुछ गलत कर बैठी तो, न, न, ये मुझसे नही होगा' ऐसा बोलकर वो कोने में चुपचाप बैठ गयी। 'तुम्हारे जैसा पति, बहुत किस्मतवाली औरतो को ही मिलता है, पर में शायद तुम्हारे लायक नही' और शालिनी फिर से फूट फूट कर रोने लगी। दुर्गेश ने उसे समझा बुझा कर चुप कराया और इत्मिनान दिलाया कि कुछ भी हो जाएं वो शालिनी का साथ नही छोड़ेगा।
और अगले ही दिन मुलाकात का वक़्त मुकर्रर हुआ, तय समय पर रमेश जनकपुरी के सीसीडी में पहुँच चुका था, ये वही जगह थी जहां वो दोनों प्रेमी कभी मिला करते थे।
दुर्गेश शालिनी को वहाँ छोड़ कर बाहर ही सिगरेट सुलगाने लगा। उसके दिल मे बहुत जलन भी थी, की इतना प्यार करने पर भी शालीनी आज भी रमेश पर मरती है, 'आखिर है क्या उसमें जो मुझमे नही', और वो खुद को संयत न कर पाया। उसने झट सीसीडी में पहुच कर रमेश का कालर पकड़ कर उठा लिया, और लगाए दो झापड़, पर ये क्या रमेश तो किसी बच्चे की तरह सुबक रहा था, सामने शालिनी नदारद थी, और रखा हुआ था एक पत्र, कांपते हाथों से दुर्गेश ने वो उठाया, और एक ही साँस में पढ़ डाला। 'मादर**, तूने उसे जाने कैसे दिया' और रमेश को धक्का दे कर वो बाहर की तरफ भागा, रमेश भी उसके पीछे पीछे आने लगा।
बाहर आकर दुर्गेश ने रेणुका को फ़ोन लगाया, और उसको सारी वस्तुस्तिथि से अवगत कराया, 'आखिर जा कहाँ सकती है वो' , इतना कह के वो रमेश की तरफ पलटा, रमेश ने ना में सिर हिलाया। और अब ये दोनों दीवाने गली गली, कूचा कूचा ढूंढने लगे, अपने प्यार और ज़िन्दगी को।
रेणुका वापिस फ़ोन करती है, और दुर्गेश को एक कॉमन फ़्रेंड का नंबर देती है।
और दुर्गेश उस कॉमन फ्रेंड जो कि शालिनी का साइकोलोजिस्ट भी था, को कॉल करता है।
'साज़िद साहब, बोल रहे हैं', सामने से हां में जवाब आया।
दुर्गेश फटाफट से सारी बाते साज़िद से कह डालता है।
साज़िद उसे एक पता देतें हैं, और अपने पास बुलवा लेते हैं।
दुर्गेश साज़िद के क्लिनिक पहुंचता है, साथ ही रमेश भी।
साज़िद उनको इत्मिनान से बैठने को कहते हैं, और फिर एक बड़े राज़ का खुलासा करते हैं।
'शालिनी का एबॉर्शन नही हुआ था, उसने एक बच्चे को जन्म दिया था, जो आज एक अनाथाश्रम मे है'।
'हाँ, ये बात उसने उस पत्र में लिखी थी' रमेश ने बताया।
'पर अब वो कहा हैं' दुर्गेश चिहुंक उठा, 'जनाब माँ, आख़िर जा कहाँ सकती है' साज़िद मियाँ बोले। 'तो आप कृप्या उसका पता मुझे दे दें, में उसको हर हाल में स्वीकारूँगा' दुर्गेश बोला।
'शालिनी आप दोनों के नाम एक चिट्ठी लिख गयी है, पहले पढ़ लीजिये फिर कोई निष्कर्ष पर पहुँचियेगा' साजिद की ये बात सुन कर दोनों चुप हो गए, रमेश ने वो पत्र लेकर पढ़ना शुरू कर दिया।
'प्यारे रमेश, और मेरी जान दुर्गेश,
जब तुम्हे ये पत्र मिलेगा तो मैं कही दूर जा चुकी होंगी,
अपने बेटे निशांत के साथ, माँ बाबा ने मुझसे झूठ कहा था कि मेरा बेटा मरा हुआ पैदा हुआ है, और मै ये जानती हूँ कि तुम दोनों के मन मे शक रहेगा कि ये बच्चा मेरी पहली शादी से पैदा हुआ, या फिर रमेश की औलाद है।
मेरे लिए केवल ये मायने रखता है, की ये मेरी औलाद है।
तुम्हारा ये पितृसत्तात्मक समाज, हमेशा मुझे दयनिय या हेय दृष्टी से दिखेगा, और में नही चाहती कि ये बड़ा होकर तुम्हारे ही जैसा हो जाएं,
दुर्गेश जब तुमने मुझे रमेश से मिलने को कहा, मैने तुम्हारी आँखों मे एक डर देखा, की कहिं मै रमेश के साथ भाग न जाऊं, तो सोचो मेरा एक बच्चा भी है, जो समाज के लिए नाजायज़ है, ये सुनके तो तुम्हारे होश ही उड़ जाते। और रमेश, तुम न , तब सक्षम थे और न अब,
तुम शायद मेरे लिए बने ही नहीं।
और मेरा निर्णय है कि मैं एक स्वतंत्र अभिभावक और एक मिसाल बनूँ , आने वाली पीढ़ी के लिए, नारी को भी पूरा हक़ है, अपने निर्णय लेने का। और यदि तुम्हे ऐतराज हो, मेरे नारीवादी होने से, तो अब इसकी आदत डाल लो।
आज की नारी किसी से दबी, और कुचली नही जाएगी, वो आवाज़ उठाएगी, और अपने हितों के लिए लड़ेगी भी।
मूझे ढूंढ़ने की कोशिश मत करना, मै आज भी उतनी ही जिद्दी और स्वाभिमानी हूँ।
तुम्हारी शालिनी।'
इतना सुनके तीनो एक दूसरे का मुंह देखने लगे। रमेश चुपके से क्लिनिक से खिसक आया, और दुर्गेश भी।
साज़िद ने आवाज़ लगाई
'बहन, तुम अब बाहर आ सकती हो, दोनों महान पुरुष अब जा चुकें है'।
शायद उसको इस बात का इल्म ना था, की रमेश उससे बेहद प्यार करता था, रमेश के जीवन के दो ही लक्ष्य थे, एक खुद को इतना कामयाब बनाना की उसके परिवार में किसी दुख का साया भी ना आ सके, और दूसरा शालिनी को अपनी जीवनसंगिनी बनाना। पर परिवार में आई एक बड़ी विपत्ति ने, उसे इन दोनों से बहुत दूर कर दिया। अपने परिवार को इस समस्या से उबारने के लिए, उसने तिलांजलि दे दी अपने सर्वस्व की, मित्रो ने बहुधा कहा भी, की कलयुग में श्रवण कुमार ना बनो, पर उसने एक की नही सुनी, लगभग 10 वर्षो के बाद, शालिनी से उसकी फेसबुक पर बात हुई, वो बहुत खुश था, फुला न समा रहा था, पर उसकी खुशी तो बेमानी निकली।
शालिनी वो पहले वाली शालिनी न रही थी, इन दस सालों में कई मुसीबतों से गुजर चुकी थी वो, दो शादी, एक डिवोर्स, एबॉर्शन और मानसिक यातनाओ से उबरने के लिए थेरपी ले रही थी। नई शादी भी फिलहाल एक समझौता मात्र थी। रमेश के मन मे कई सवाल थे, और वो शालिनी से मिलना भी चाहता था, पर शालिनी और रमेश के बीच हाय हैल्लो के अलावा कोई शब्द ही नही होता था बात करने को। शालिनी की दोस्त रेणूका के बाबत रमेश को शालिनी की वर्तमान अवस्था का अंदाज़ा हो चुका था, और उसका प्यार शालिनी के लिए बढ़ता ही जा रहा था, शालिनी को भी , रेणुका ने रमेश का पूरा सच बतला दिया था। और 2 मार्च की रात को शालिनी का फ़ोन रमेश को आया। 'आज का दिन याद है तुम्हे', शालिनी की मनमोहक आवाज़ ने रमेश की हृदयगति को मानो 10 गुना बढ़ा दिया था। अकबका सा रमेश 'न नहीं तो' प्रत्युत्तर में बोल चुका था, सामने से जवाब आया , 'आजके ही दिन तुमने मुझे छोड़ दिया था' और रोने की आवाज़ के साथ फ़ोन कट हो गया। रमेश को मानो तो जैसे सांप सूंघ गया था। निस्तब्ध, अनमना सा वो बिस्तर पर गिर गया, सारी पुरानी बाते अचानक से उसके मस्तिष्कपटल पर घूमने लगी।
रोती हुई शालिनी को देख कर, पीछे से उसके पति दुर्गेश ने पुचकारा, सहमी सी वो दुर्गेश के आलिंगन में जकड़ गयी। दुर्गेश उसका हमसफर ही नही, अच्छा मित्र भी था, और शालिनी के अतीत से वाकिफ भी था। 'एक बार मिल क्यो नही लेती तुम उससे, आखिर उसको भी अधिकार है अतीत से बाहर आकर आज में जीने का'। शालिनी हतप्रभ सी दुर्गेश को देखने लगी, 'क्या कह रहें है आप, जानते भी है, की मैं उससे मिली तो खुद को रोक न पाउंगी, और कुछ गलत कर बैठी तो, न, न, ये मुझसे नही होगा' ऐसा बोलकर वो कोने में चुपचाप बैठ गयी। 'तुम्हारे जैसा पति, बहुत किस्मतवाली औरतो को ही मिलता है, पर में शायद तुम्हारे लायक नही' और शालिनी फिर से फूट फूट कर रोने लगी। दुर्गेश ने उसे समझा बुझा कर चुप कराया और इत्मिनान दिलाया कि कुछ भी हो जाएं वो शालिनी का साथ नही छोड़ेगा।
और अगले ही दिन मुलाकात का वक़्त मुकर्रर हुआ, तय समय पर रमेश जनकपुरी के सीसीडी में पहुँच चुका था, ये वही जगह थी जहां वो दोनों प्रेमी कभी मिला करते थे।
दुर्गेश शालिनी को वहाँ छोड़ कर बाहर ही सिगरेट सुलगाने लगा। उसके दिल मे बहुत जलन भी थी, की इतना प्यार करने पर भी शालीनी आज भी रमेश पर मरती है, 'आखिर है क्या उसमें जो मुझमे नही', और वो खुद को संयत न कर पाया। उसने झट सीसीडी में पहुच कर रमेश का कालर पकड़ कर उठा लिया, और लगाए दो झापड़, पर ये क्या रमेश तो किसी बच्चे की तरह सुबक रहा था, सामने शालिनी नदारद थी, और रखा हुआ था एक पत्र, कांपते हाथों से दुर्गेश ने वो उठाया, और एक ही साँस में पढ़ डाला। 'मादर**, तूने उसे जाने कैसे दिया' और रमेश को धक्का दे कर वो बाहर की तरफ भागा, रमेश भी उसके पीछे पीछे आने लगा।
बाहर आकर दुर्गेश ने रेणुका को फ़ोन लगाया, और उसको सारी वस्तुस्तिथि से अवगत कराया, 'आखिर जा कहाँ सकती है वो' , इतना कह के वो रमेश की तरफ पलटा, रमेश ने ना में सिर हिलाया। और अब ये दोनों दीवाने गली गली, कूचा कूचा ढूंढने लगे, अपने प्यार और ज़िन्दगी को।
रेणुका वापिस फ़ोन करती है, और दुर्गेश को एक कॉमन फ़्रेंड का नंबर देती है।
और दुर्गेश उस कॉमन फ्रेंड जो कि शालिनी का साइकोलोजिस्ट भी था, को कॉल करता है।
'साज़िद साहब, बोल रहे हैं', सामने से हां में जवाब आया।
दुर्गेश फटाफट से सारी बाते साज़िद से कह डालता है।
साज़िद उसे एक पता देतें हैं, और अपने पास बुलवा लेते हैं।
दुर्गेश साज़िद के क्लिनिक पहुंचता है, साथ ही रमेश भी।
साज़िद उनको इत्मिनान से बैठने को कहते हैं, और फिर एक बड़े राज़ का खुलासा करते हैं।
'शालिनी का एबॉर्शन नही हुआ था, उसने एक बच्चे को जन्म दिया था, जो आज एक अनाथाश्रम मे है'।
'हाँ, ये बात उसने उस पत्र में लिखी थी' रमेश ने बताया।
'पर अब वो कहा हैं' दुर्गेश चिहुंक उठा, 'जनाब माँ, आख़िर जा कहाँ सकती है' साज़िद मियाँ बोले। 'तो आप कृप्या उसका पता मुझे दे दें, में उसको हर हाल में स्वीकारूँगा' दुर्गेश बोला।
'शालिनी आप दोनों के नाम एक चिट्ठी लिख गयी है, पहले पढ़ लीजिये फिर कोई निष्कर्ष पर पहुँचियेगा' साजिद की ये बात सुन कर दोनों चुप हो गए, रमेश ने वो पत्र लेकर पढ़ना शुरू कर दिया।
'प्यारे रमेश, और मेरी जान दुर्गेश,
जब तुम्हे ये पत्र मिलेगा तो मैं कही दूर जा चुकी होंगी,
अपने बेटे निशांत के साथ, माँ बाबा ने मुझसे झूठ कहा था कि मेरा बेटा मरा हुआ पैदा हुआ है, और मै ये जानती हूँ कि तुम दोनों के मन मे शक रहेगा कि ये बच्चा मेरी पहली शादी से पैदा हुआ, या फिर रमेश की औलाद है।
मेरे लिए केवल ये मायने रखता है, की ये मेरी औलाद है।
तुम्हारा ये पितृसत्तात्मक समाज, हमेशा मुझे दयनिय या हेय दृष्टी से दिखेगा, और में नही चाहती कि ये बड़ा होकर तुम्हारे ही जैसा हो जाएं,
दुर्गेश जब तुमने मुझे रमेश से मिलने को कहा, मैने तुम्हारी आँखों मे एक डर देखा, की कहिं मै रमेश के साथ भाग न जाऊं, तो सोचो मेरा एक बच्चा भी है, जो समाज के लिए नाजायज़ है, ये सुनके तो तुम्हारे होश ही उड़ जाते। और रमेश, तुम न , तब सक्षम थे और न अब,
तुम शायद मेरे लिए बने ही नहीं।
और मेरा निर्णय है कि मैं एक स्वतंत्र अभिभावक और एक मिसाल बनूँ , आने वाली पीढ़ी के लिए, नारी को भी पूरा हक़ है, अपने निर्णय लेने का। और यदि तुम्हे ऐतराज हो, मेरे नारीवादी होने से, तो अब इसकी आदत डाल लो।
आज की नारी किसी से दबी, और कुचली नही जाएगी, वो आवाज़ उठाएगी, और अपने हितों के लिए लड़ेगी भी।
मूझे ढूंढ़ने की कोशिश मत करना, मै आज भी उतनी ही जिद्दी और स्वाभिमानी हूँ।
तुम्हारी शालिनी।'
इतना सुनके तीनो एक दूसरे का मुंह देखने लगे। रमेश चुपके से क्लिनिक से खिसक आया, और दुर्गेश भी।
साज़िद ने आवाज़ लगाई
'बहन, तुम अब बाहर आ सकती हो, दोनों महान पुरुष अब जा चुकें है'।
- कहानी समाप्त।
लेखक - गुमराह मोगैम्बो (जितेन्द्र चोथानी)
लेखक - गुमराह मोगैम्बो (जितेन्द्र चोथानी)
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